बात यही कोई 2005 के आस-पास की ही होगी क्या दिन थे वो यार... उम्र भी लगभग 10-11 साल ही रही होगी जब तुम्हारी वो पतले टायर वाली आधी लाल और लगभग पूरी काली सी साइकिल उठा कर हम हर शाम में निकल पड़ते थे ना किसी तरह की नौकरी की टेंशन न ही सैलरी की ज़रूरत और ना ही किसी गर्लफ्रैंड वर्लफ्रेंड का चक्कर हम खुद में ही मस्त रहते थे।और तुम्हारी बेईमानी भी याद है जो तुम कहते थे कि आज तू चला ले साईकिल कल मैं चला दूंगा और वो कल कभी नही आया।और सबसे अच्छा तो उस सफर का नाम होता था 'अनजानी राहों पर'...
और जब अंधेरा होते ही हम लौटते थे अपनी उस 'अनजानी राहों से' तो तेरी अम्मी की छड़ी भी याद है जो तू अगले दिन क्लास में तब बताता था जब टीचर पढ़ा रहें हो और अपने साथ मुझे भी मार खिलवाता था....और तेरे झूठे बहानो का तो कहना ही क्या उनमे भी तू मुझे अपना 'सह-अपराधी' बनाता था... क्या दिन थे वो यार।।।
Monday, February 11, 2019
*मैं और मेरा दोस्त*
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